बिहार भारत का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। जिसके नागरिक भविष्य में केंद्रीय परीक्षा को उत्तीर्ण कर आधिकारिक पदों को सुशोभित करते हैं। माना जाता है 1952 तक बिहार सबसे सुशासित राज्य था। 270 ईसा पूर्व मगध नाम से विख्यात बिहार सम्राट अशोक की राजधानी रहा है। लेकिन वर्तमान राजनीति में बिहार का नाम अराजक राज्यों में आता है।
बिहार ने ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता के गुमान को तोड़ा था। लेकिन वर्तमान में वही बिहार अशिक्षा और बेरोजगारी का गढ़ बन गया है। बिहार से निकले कवियों, साहित्यकारों और जिलाधिकारियों ने देश का मनोबल बढ़ाया है लेकिन बिहार के भविष्य को संवारने में असफल रहे।
जयप्रकाश के आंदोलन ने बिहार के 2 राजनेताओं की राजनीति को जन्म दिया। जिनका नाम था लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार। इस समय बिहार की राजनीति में रामविलास पासवान, चिराग पासवान, नीतीश कुमार, तेजप्रताप, तेजस्वी यादव, राबड़ी देवी, सुशील कुमार मोदी, जीतन राम मांझी, मनोज झा, अखिलेश सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा आदि नेता प्रमुख हैं।
आइए हम जानने का प्रयास करते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव किन मुद्दों को लेकर होगा? वर्तमान में बिहार की राजनीति की परिस्थितियां क्या हैं?
अगर हम 2019 लोकसभा चुनाव के बारे में बात करें तो 243 विधानसभा सीटों में से भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन 225 सीटों पर आगे रहा था। कोरोना संक्रमण के बीच बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। अभी विपक्षी लगातार सत्ता पक्ष पर प्रहार कर रहे हैं। इसमें तेजस्वी यादव का कहना था, “राज्य में टेस्टिंग कम होने की वजह से यह पता ही नहीं चल सका कि कोरोनावायरस कब बिहार में फैल गया? इस समय में चुनाव कराने की कोई भी आवश्यकता नहीं है।”
पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने मंगलवार से ‘बदलो बिहार, बनाओ बिहार’ यात्रा शुरू कर दी है। यशवंत सिन्हा का कहना है, “हम बिहार को एनडीए गठबंधन और महागठबंधन के अतिरिक्त एक तीसरा विकल्प देने की कोशिश करेंगे।” यशवंत सिन्हा की ओर से अभी यह बात सामने नहीं आई है कि उनके इस गठबंधन में कौन-कौन से नेता शामिल होंगे।
लेकिन जब यह यात्रा शुरू की गई तो जहानाबाद के पूर्व सांसद अरुण कुमार और पूर्व मंत्री रेणु कुशवाहा उनके साथ दिखाई दिए थे। इसके अलावा आरजेडी नेता तेजस्वी यादव अपनी जनसभा में यह दावा कर चुके हैं कि यदि हमारी सरकार बिहार में बनती है तो हम बेरोजगारों को रोजगार देंगे।
चिराग पासवान और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच बढ़ती दूरियां
एलजेपी प्रमुख चिराग पासवान और सीएम नीतीश कुमार के बीच रिश्ते अच्छे नहीं हैं। कुछ सूत्रों के द्वारा यह जानकारी मिली है कि चिराग पासवान को जब नीतीश कुमार कॉल करते हैं तो वह पलट कर बात भी नहीं करते। इसका यह अर्थ है कि दोनों के बीच संबंध सामान्य नहीं है। संबंधों में खटास की वजह कोटा छात्रों की पुकार और प्रवासी मजदूरों का दर्द बताया जा रहा है।
इस पर चिराग पासवान ने खुलकर नीतीश कुमार का विरोध भी किया था। ऐसा भी माना जा रहा है कि चिराग पासवान की पार्टी बिहार में कांग्रेस के साथ भी हो सकती है क्योंकि आरक्षण के मुद्दे पर जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था की आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। तब भारतीय जनता पार्टी ने उसका विरोध नहीं किया था।
चिराग पासवान पहले ही साफ कर चुके हैं कि वह भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी हैं, नीतीश कुमार के नहीं। इसके अलावा गिरिराज सिंह ने जब कहा था, “हमारे पूर्वजों की गलती के कारण मुसलमान भारत में रह रहे हैं।” तब चिराग पासवान ने इसका खुलकर विरोध किया था। ऐसे में चिराग पासवान की पार्टी कांग्रेस का समर्थन भी कर सकती है।
लेकिन एक बात यह भी तय है कि रामविलास पासवान इस बात को जानते हैं कि अगर वे महागठबंधन के साथ गए तो उन्हें वह दिन याद है जब 2009 के लोकसभा चुनाव और 2010 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी का खाता भी नहीं खुला था। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी का समर्थन छोड़ना रामविलास पासवान के लिए संभव नहीं होगा।
कोरोना संक्रमण के बीच जब बिहार के हजारों लाखों मजदूर अपने प्रदेश की ओर पलायन कर गए। उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने गरीब कल्याण योजना के तहत 5 महीनों तक मुफ्त राशन की योजना को जारी किया है। यह योजना बिहार के मजदूरों के लिए एक रामबाण की तरह कार्य करेगी।
बिहार में नीतीश कुमार का कोई विकल्प नहीं
बिहार की राजनीति में एक बात तो तय है कि एनडीए के गठबंधन में नीतीश कुमार के सामने कोई भी भारतीय जनता पार्टी के पास ऐसा प्रत्याशी नहीं है जिसे मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया जा सकता हो। इसका अर्थ यह भी निकलता है कि नीतीश कुमार इस बार भी एनडीए गठबंधन में अपनी इच्छा के अनुसार सीट लेने में कामयाब हो जाएंगे। नीतीश कुमार को यह भी पता है कि अब तक तेजस्वी यादव ना तो महागठबंधन के बिखरे हुए साथियों को एक करने में सफल हुए हैं और ना ही वह खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बना सकेंगे।
इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी के पूर्व साथी जीतन राम मांझी भी एनडीए गठबंधन में वापस आ सकते हैं। क्योंकि यदि रामविलास पासवान की एलजेपी ने भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ा तो उसके स्थान पर जीतन राम मांझी की पार्टी का साथ भारतीय जनता पार्टी को मिल जाएगा। इसका एक कारण यह भी है प्रदेश ने लालू का अंधा राज देखा है। इसलिए प्रदेशवासी दुबारा वह भूल नहीं दोहराना चाहेंगे।
बदले हालातों में किसके हाथों में होगी बिहार की कमान?
कोरोनावायरस चलते यह बात तो तय है कि बड़ी-बड़ी मीटिंग्स और जनसभाएं आयोजित करने की तो बात सारी पार्टियां लगभग भूल ही चुकी हैं। ऐसे में बिहार में डोर टू डोर जाकर चुनाव प्रचार करना होगा। यदि चुनाव पूरी तरीके से सोशल मीडिया पर आधारित हुआ तो ऐसे में वह पार्टी सबसे ज्यादा फायदा उठा सकेगी, जिसके पास धन और तकनीकी ज्ञान का भंडार होगा।
अगर पूरा चुनाव सोशल मीडिया के आधार पर लड़ा गया तो निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी को बहुत अच्छी जीत मिलेगी क्योंकि उनका सबसे बड़ा वोट बैंक है सवर्ण (अपर कास्ट)। सवर्णों की उपस्थिति सोशल मीडिया पर सबसे अधिक है। बड़े शहरों और छोटे नगरों में भी भारतीय जनता पार्टी की पहुंच बहुत हद तक मध्यम परिवारों तक भी है और वे ही लोग इस समय सोशल मीडिया पर राज कर रहे हैं।
मजदूरों के पैरों के छाले किस पार्टी को करेंगे जख्मी
कोरोनावायरस के संक्रमण के बाद हमने यह देखा कि इसकी सबसे ज्यादा मार गरीब प्रवासी मजदूरों पर पड़ी है। जिसके कारण प्रवासी मजदूर को पलायन करना पड़ा। जिसमें बहुत अधिक संख्या बिहार राज्य की भी थी। इस पलायन में लाखों मजदूरों ने विभिन्न प्रकार के कष्टों को सहन किया। तब जाकर वे अपने घर पहुंच सके।
इसमें नीतीश कुमार की भी बहुत बड़ी गलती रही कि उन्होंने किसी भी प्रकार से प्रारंभ में इस समस्या से निबटने की कोई भी तैयारी नहीं की थी और इस समय मजदूरों के मन में केंद्र सरकार और नीतीश बाबू के खिलाफ गुस्सा भी है। तो ऐसा माना जा सकता है कि इस चुनाव में अगर मजदूरों ने अहम भूमिका निभाई तो शायद भारतीय जनता पार्टी गठबंधन को नुकसान हो सकता है।
लेकिन अगर सोशल मीडिया के ऊपर पूरा चुनाव लड़ा गया तो परिस्थितियां कुछ विपरीत होंगी क्योंकि मजदूर बहुत कम ही सोशल मीडिया पर मुखर हैं। इस प्रकार बिहार कि राजनीति कोरोना संक्रमण और मजदूरों के पलायन पर आधारित हो सकती है। अगर यह चुनाव सोशल मीडिया के आधार पर लड़ा गया तो निश्चित रूप से अपर कास्ट का कास्ट फेक्टर बहुत काम करेगा जिसमें भाजपा को महारथ हासिल है। देखना यह होगा क्या इस चुनाव में मजदूर अपने मन से फैसला लेंगे या फिर चुनावी वादों के आधार पर इस चुनाव को जीता जायेगा।



