कृषि अधिनियम के खिलाफ लगातार विपक्ष की गंदी राजनीति जारी है। लगातार प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार का विरोध और उसकी बदनामी को लेकर विपक्ष को सत्ता पक्ष के लोग घेर रहे हैं। लेकिन इसी बीच में देखा जा रहा है कि कांग्रेस जैसी कुछ पार्टियों के झूठ धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं। दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस एनसीपी और शिवसेना की सरकार ने इस अध्यादेश को पहले ही जारी कर दिया था। महाराष्ट्र सरकार में शामिल कांग्रेस और एनसीपी ने बिल का खुलकर विरोध किया है। वहीं शिवसेना की भूमिका पर अभी भी संदेह किया जा रहा है। 10 अगस्त 2020 को राज्य सरकार ने केंद्र द्वारा लाए गए किसान बिल के तीनों अन्य देशों को सख्ती से लागू करने के आदेश दिए थे। पिछले महीने तक महाराष्ट्र में शुरुआती राज्य में था, जो इस अध्यादेश को तत्काल और सख्ती से लागू करना चाहते थे। दो पेज के इस ऑर्डिनेंस को 10 अगस्त 2020 के दिन मार्केटिंग के स्टेट डायरेक्टर सतीश सोनी ने सभी बाजार समितियों को सख्ती से लागू करने को कहा था। कृषि विधेयकों पर शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की अलग अलग भूमिका देखने को मिल रही है। हालांकि बोलने के नाम पर यह तीनों ही पार्टियां कृषि सुधार अधिनियम का विरोध कर रही हैं।
2 दिन पहले महाराष्ट्र सरकार में राजस्व मंत्री बाला साहब ने कहा था कि महाराष्ट्र में इन कानूनों को लागू नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा, ” संसद द्वारा पारित यह बिल किसान विरोधी है। इसलिए हमें इसका विरोध कर रहे हैं। महा विकास आघाडी भी इसका विरोध करेगी और महाराष्ट्र में से लागू नहीं होने देगी, शिवसेना भी इस मुद्दे पर हमारे साथ है। हम एक साथ बैठेंगे और रणनीति बनाएंगे। ” इस खुलासे के बाद लगातार यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि कांग्रेस और एनसीपी इसके विरोध में है तो राज्य में पहले ही अध्यादेश कैसे जारी कर दिया गया? अगर उन्हें इसका विरोध करना था तो फिर राज्य में अध्यादेश को जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या वास्तव में कांग्रेस इस अध्यादेश को लेकर राजनीति कर रही है?



