आप सभी जानते हैं कि भारत में हमेशा सरकारी और प्राइवेट सेक्टर के बीच एक सीमा रेखा खिंची चली आई है और यह सीमा रेखा है गुणवत्ता की सीमा रेखा। आज के इस लेख का शीर्षक है, “राज्यों की विफलता का मानक है कोचिंग सेंटर, प्राइवेट हॉस्पिटल्स और प्राइवेट स्कूल”। आप सभी जानते हैं कि भारत के प्रत्येक राज्य में कुछ केंद्र द्वारा संचालित तथा कुछ राज्य सरकार द्वारा संचालित विद्यालय और अस्पताल हैं और उनकी गुणवत्ता पर हमेशा सवाल उठता रहा है।
हम सभी यह जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा जल मुहैया कराना प्रत्येक सरकार की मूलभूत जिम्मेदारी है। लेकिन पिछले 70 सालों में हमारी सरकारों की और राजनेताओं की यह जिम्मेदारी पूरी तरह से निष्फल होती दिखाई दे रही है क्योंकि हमारी राज्य सरकारें प्रत्येक व्यक्ति को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था मुहैया नही करा पाईं। इसी कारणवश हमारे देश में प्राइवेट हॉस्पिटल, प्राइवेट विद्यालय और कोचिंग इंस्टीट्यूट भारी संख्या में बढ़ते चले गए।
असुविधा के केंद्र बने सरकारी विद्यालय
आप सभी जानते हैं कि प्रत्येक राज्य सरकार ग्रामीण इलाकों में विद्यालय संचालित करती है। अगर हम उस विद्यालय को सरकार से दी जाने वाली सुविधाओं की बात करें तो सरकार की ओर से इस विद्यालय को तथा उसमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों को निम्न सुविधाएं दी जाती हैं:
- प्रतिवर्ष पढ़ने के लिए पठन-पाठन सामग्री
- पहनने के लिए विद्यालय का गणवेश
- प्रतिदिन मिड डे मील की योजना द्वारा भोजन
- समय-समय पर सरकार द्वारा आर्थिक मदद
विद्यालय के रखरखाव के लिए सरकार द्वारा आर्थिक मदद सरकारी विद्यालय से समाज का उठता विश्वास इसके अलावा विद्यालय में पढ़ाने वाले अध्यापकों के वेतन का भी पूरा खर्च सरकार उठाती है! यदि हम आपसे छोटे स्तर की बात करें तो भी अध्यापक को लगभग 50000 रूपये प्रतिमाह सरकार की ओर से दिए जाते हैं! लेकिन इसके बावजूद भी कोई भी व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में पढ़ाने के लिए नहीं भेजता। इसका कारण क्या है? इसका कारण है कि पिछले 70 सालों में हमारी सरकारी व्यवस्थाएं प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास नहीं दिला पाईं कि हमारे सरकारी विद्यालय में उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा।
सरकार द्वारा इतनी मदद मिलने के बाद भी कभी विद्यालय का भवन सुरक्षित नहीं होता, कभी बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ होता है तो कभी अध्यापक अपने कर्तव्य से विमुख हो जाते हैं। इसका कारण क्या होता है? जिस आयु में छात्र-छात्राओं को मार्गदर्शन प्राप्त होना चाहिए कि उन्हें अपने भविष्य में किस तरह से शिक्षा प्राप्त करनी है? उस समय में उनके लिए न तो अच्छी शिक्षा मिल पाती है और न ही अच्छे संस्कार! अगर इसके विपरीत प्राइवेट विद्यालय की बात करें, तो प्राइवेट विद्यालय में विद्यार्थी द्वारा लिया जाने वाला मासिक शुल्क विद्यालय की प्रतिष्ठा अनुसार घटता बढ़ता रहता है! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा संचालित शिशु मंदिर से लेकर ईसाई मिशनरियों तक सब के अलग-अलग शुल्क हैं। जो कि सरकारी विद्यालय से बहुत ज्यादा हैं।
- प्राइवेट विद्यालय में ली जाने वाली फीस सरकारी विद्यालयों से बहुत ज्यादा होती है।
- प्राइवेट विद्यालय में शिक्षकों को दिया जाने वाला वेतन सरकारी विद्यालयों से बहुत कम होता है!
- विद्यालय की ओर से किसी विद्यार्थी को कोई स्कॉलरशिप नहीं दी जाती, कहीं-कहीं सरकार की ओर से दी जाती है।
- विद्यालय की ओर से किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की कोई पठन-पाठन सामग्री मुफ्त नहीं दी जाती है।
- पूरे वर्ष अलग-अलग प्रकार से विद्यार्थियों से अलग-अलग शुल्क वसूल किए जाते हैं।
इतना बड़ा अंतर होने के पश्चात भी हमारे सरकारी विद्यालय अभी भी प्राइवेट विद्यालयों को टक्कर देने में नाकाम साबित हो रहे हैं। रिजल्ट आने पर सरकारी विद्यालयों का जिस प्रकार से स्तर गिरता हुआ दिखाई देता है वह निश्चित रूप से शर्मनाक है। एक रिक्शा चलाने वाले से लेकर एक बड़ा उद्योगपति भी यह चाहता है कि वह अपनी बच्चों को सरकारी स्कूल में न पढ़ाने की बजाए प्राइवेट विद्यालय में पढ़ाये। क्योंकि वह सरकारी विद्यालयों की हकीकत को जानता है!…
कैसे होगा सुधार?
यदि इस व्यवस्था में सुधार करना है तो राजनीतिक कदमों के साथ कुछ कठोर तथा सामाजिक कदम भी उठाने होंगे। सर्वप्रथम सरकारी विद्यालय में शिक्षा देने वाले अध्यापकों का उनकी सेवा के बीच में प्रतिवर्ष एक टेस्ट कराया जाए! जिससे उनकी योग्यता कि प्रतिवर्ष जांच हो सके और उस टेस्ट में आने वाले अंकों के अनुसार उस शिक्षक की पदोन्नति हो, उसे वेतन आयोग का लाभ मिले!.. लेकिन ऐसा नहीं है कि यह व्यवस्था केवल अध्यापकों के लिए लागू होने चाहिए। अपितु इस व्यवस्था को राजनेताओं से लेकर अधिकारियों तक सब स्थानों पर लागू कराया जाना चाहिए। क्योंकि केवल सरकारी शिक्षा विभाग ऐसा नहीं है जिसमें इस तरह की व्यवस्थाएं हैं।
इसके अलावा समय-समय पर विद्यालय में किसी उच्च अधिकारी शिक्षा अधिकारी के द्वारा विद्यालय में किस प्रकार की शिक्षा दी जा रही है इसकी जांच कराई जाए? लेकिन ध्यान रहे कि जांच करने वाला अधिकारी किसी प्रकार का भ्रष्टाचारी या भारत की व्यवस्था को खराब कर आने वाला न हो।
लेकिन बच्चे के भविष्य को सुधारना केवल अध्यापक यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है या उसके परिवार की भी जिम्मेदारी है क्योंकि उनकी संतानें यदि विद्यालय में पढ़ने जा रहे हैं तो क्या पढ़ रहे हैं? क्या विद्यालय में पढ़ाई भी हो रही है या नहीं हो रही है? अगर कोई समस्या है तो इस समस्या का भी समाधान अभिभावकों को करना चाहिए।
अगर इस तरह के कुछ अच्छे कदम सरकार और समाज उठाएगा तो निश्चित रूप से हमारे सरकारी विद्यालय प्राइवेट विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं को टक्कर देने की ताकत रखेंगे।



