इस बार बिहार विधानसभा चुनाव हर बार के विधानसभा चुनाव से अलग होने वाला है। क्योंकि इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान, रघुवंश प्रसाद सिंह और शरद यादव जैसे दिग्गज नेता मौजूद नहीं होंगे। वहीं दूसरी ओर इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में चार गठबंधन चुनाव लड़ रहे हैं, वही पुष्पम चौधरी की प्लूरल्स पार्टी भी चुनावी मैदान में है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, महागठबंधन, चंद्रशेखर रावण और पप्पू यादव का गठबंधन और उधर उपेंद्र कुशवाहा तथा बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन, यह सभी गठबंधन इस बार बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी अपनी ताकत आजमाने की कोशिश कर रहे हैं।
इस बार कि बिहार विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी यानी रामविलास पासवान की एलजेपी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ चुनाव नहीं लड़ेगी। एलजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान हमेशा से ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विरोधी रहे हैं, और इस बार उन्होंने निर्णय कर लिया है कि वह जनता दल यूनाइटेड के खिलाफ अपने प्रत्याशी उतारेंगे लेकिन भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ नहीं उतारेंगे।
नीतीश कुमार मंजूर नहीं!
चिराग पासवान का मानना है कि इस बार बिहार में भारतीय जनता पार्टी और लोक जनशक्ति पार्टी की सरकार बनेगी उन्हें नीतीश कुमार का नेतृत्व पसंद नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि यह भारतीय जनता पार्टी की चाल है तो वहीं कुछ लोग इस कहानी को 15 साल पीछे के नजरिए से देखते हैं।
रामविलास पासवान का राजनीतिक जीवन
70 के दशक में बिहार में केवल 3 नेता ही लोकप्रिय थे जिनमें लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान का नाम शामिल था। यह तीनों लगभग एक ही समय पर राजनीति में आए थे, और एक दूसरे के मित्र भी थे। इनकी मित्रता राजनीतिक कैरियर के अनुसार ज्यादा दिनों तक नहीं चली और 1994 में नीतीश ने जनता दल बनाया वही 1997-98 में लालू प्रसाद यादव तथा पासवान के रास्ते भी अलग हो गए। सन 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और पासवान ने एक साथ मिलकर लालू प्रसाद यादव के खिलाफ चुनाव लड़ा। लेकिन बहुत बड़ी कामयाबी नहीं हासिल हुई। राज्यपाल की कृपा से नितीश 7 दिन के लिए मुख्यमंत्री बने और राज्य में फिर राष्ट्रीय जनता दल की सरकार बनी। नवंबर 2000 में पासवान ने लोक जनशक्ति पार्टी का निर्माण किया और 2002 में गुजरात दंगे के बाद एनडीए में शामिल हो गए।
रामविलास और नीतीश के बीच खटास
रामविलास पासवान के पास दलित और मुस्लिम वोट बैंक था और उनकी नजर बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी। नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान के साथ चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया और शर्त रखी के सीएम नीतीश कुमार ही बनेंगे पासवान मान गए, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि आपको भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ना होगा जो नीतीश को ठीक नहीं लगा और गठबंधन टूट गया।
फरवरी 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए लालू कांग्रेस के साथ नीतीश भारतीय जनता पार्टी के साथ और रामविलास पासवान अकेले ही मैदान में कूद गए। जब चुनाव के नतीजे आए तो किसी भी दल के पास बहुमत नहीं था लेकिन इस बार किंग मेकर की भूमिका में थे रामविलास पासवान, लेकिन उन्होंने न किसी और को सीएम बनने दिया और ना खुद सीएम बन सके। इस पूरी प्रक्रिया के बाद विधानसभा भंग हुई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा। अक्टूबर 2005 में दोबारा चुनाव हुए, और नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से बिहार के मुख्यमंत्री बने!
लोक जनशक्ति पार्टी 2005 में 178 सीटों पर लड़ी और 29 सीटों पर विजय प्राप्त की, 2005 के अक्टूबर में 203 सीटों पर लड़ कर लोजपा ने 10 सीटों पर विजय प्राप्त की, 2010 के विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी 75 सीटों पर लड़ी और 3 सीटों पर जीती, वहीं 2015 के विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी ने 42 सीटों पर अपने प्रत्याशियों को खड़ा किया और 2 सीटों पर विजय प्राप्त की।
2005 के चुनाव में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो नीतीश कुमार ने लोक जनशक्ति पार्टी के वोट बैंक दलित वोट बैंक में सेंधमारी कर दी और बिहार में करीब 16% दलित थे, जिन्हें नीतीश कुमार ने बदलकर महादलित में कन्वर्ट कर दिया। यानी 2005 अक्टूबर के बाद बिहार में केवल 4 से 5% पासवान जाति के लोग दलित रह गए बाकी अन्य 21 जातियां महादलित में कन्वर्ट हो गई। 2015 में जीतन राम मांझी ने पासवान जाति को भी महादलित बना दिया।
जेडीयू के सामने लोजपा के प्रत्याशी
जिन जातियों को नीतीश कुमार ने दलित से महादलित की ओर शिफ्ट किया था। वह रामविलास पासवान का दामन छोड़कर नीतीश कुमार के दामन में आ गई और इसका असर हुआ चुनाव में। लोक जनशक्ति पार्टी का प्रभाव धीरे-धीरे बिहार से खत्म होता चला गया। और आज के हालात यह हैं कि लोक जनशक्ति पार्टी केवल उंगलियों पर गिने जाने वाले नेताओं की पार्टी रह चुकी है। ना तो लोक जनशक्ति पार्टी का जमीन पर कोई प्रभाव है और ना ही कोई वर्चस्व। लोजपा का जेडीयू से अलग होना एक इत्तेफाक भी हो सकता है और लोग यह भी कह रहे हैं कि नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर करने के लिए भाजपा ने यह माइंड गेम खेला है।



