बेशक इस वक्त बढ़ता प्रदूषण पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है। प्रदूषण की समस्या विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में ज्यादा देखने को मिलती है। भारत भी अभी विकासशील देश की लिस्ट में शामिल है। ऐसे में यहाँ के लिये भी प्रदूषण एक बड़ी समस्या के रूप में शुमार है। हाज़रो संस्थाएं और सरकार प्रदूषण को कम करने को लेकर प्रतिबद्ध भी है, जो कि एक अच्छी बात है। प्रदूषण को लेकर चिंतित होना अच्छी बात है। लेकिन इसका ये तात्पर्य तो नहीं की हम सिर्फ धर्म से जुड़े और सामाजिक आस्था से जुड़ी चीज़ो पर ही लगाम लगाकर प्रदूषण को कम करने का बिगुल फूँके।
सिर्फ़ होली और दीवाली पर क्यों जागता है पर्यावरण प्रेम?
खासतौर पर हिन्दू धर्म की आस्था से जुड़े त्योहारों पर बुद्धजीवियों का खास निशाना रहता है। होली के त्योहार पर जल सरंक्षण अभियान चलाया जाता है, तो दीवाली पर वायु प्रदूषण का मुद्दा उठाकर पटाखे ना जलाने की शिक्षा दी जाती है। गौर करने वाली बात ये है कि, हमारे देश मे हाज़रो फैक्ट्रियां प्रदूषण के मानक को ताक पर रखकर जब दम घोंटू धुँआ उगलती है तो फिर इन बुद्धजीवियों की प्रदूषण का डर नहीं होता है। साँस और दमे की बीमारियां इन्हें सिर्फ दीवाली के पटाखे के कारण होती है।
अजब विडम्बना है कि, ये वीआईपी लोग एयर कंडीशन लगे हुए कमरे में बैठकर हवा को दूषित करते हुए पटाखे न जलाने का संदेश देते हैं। ये वही वीआईपी लोग है जो नए साल और क्रिसमस के मौके पर करोड़ो का पटाखा फूँक डालते हैं, लेकिन तब इन्हें न तो साँस लेने में तकलीफ होती है और ना ही इन्हें दमे की बीमारी होती है। ये वही वीआईपी लोग है जो अपने साथ खुद की सुरक्षा के लिये दर्जनों गाड़ियों की फौज लेकर चलते है, लेकिन तब भी इन्हें न तो देश की चिंता होती है और ना ही प्रदूषण का ख्याल आता है। इनका सारा ज्ञान और प्रदूषण की चिंता सिर्फ दीवाली के पर्व पर और होली के पर्व पर ही जागता है।
हमारी सरकारें भी अपनी नाकामी को छुपाने के लिए दीवाली पर पटाखे बैन कर के खुद की पीठ थपथपाती नजर आती है। इनका सड़को ओर चलने वाले डग्गामार वाहनों और कोल फैक्ट्री की तरह धुँआ उगलने वाली मशीनरी पर कोई लगाम नही है। जो कि साल भर में ना जाने कितना वायु प्रदूषण करते हैं और ना जाने कितने लोगों को गम्भीर बीमारियों की चपेट में धकेल देते हैं। इनका जोर बड़े-बड़े कारखानो से निकलने वाले मलबे पर नहीं है…ना ही वहाँ की चिमनियों से निकलने वाले जहर पर है। सरकार का इन जगहों पर कोई लगाम नही है, इसी वजह से ये दीवाली और होली के पर्व पर पटाखे फोड़ने और पानी बचाने का ऐलान कर के खुद की नाकामियों को छुपाते हुए, प्रदूषण रोकने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का दिखावा करती है।
क्या सिर्फ़ एक दिन पटाखों पर बैन करने से पर्यावरण हो जाएगा सुरक्षित?
सवाल यहाँ पर ये है कि क्या सिर्फ़ एक दिन दीवाली के पटाखे ना जलाने से हमारे देश की हवा बिल्कुल शुद्ध हो जाएगी..? फिर साल भर कोल फैक्ट्रियां चाहे जितना जहर उगले, सड़को पर कितने भी डग्गामार वाहन चले, उसका हवा पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा? क्या तब नए साल पर पटाखे जलाने का असर भी खत्म हो जाएगा? और क्या तब क्रिसमस के पर्व पर जलने वाले पटाखे से हवा शुद्ध हो उठेगी..? क्या तब इन वीआईपीज की गाड़ियों की कतार से निकलने वाला धुँआ हवा को शुद्ध कर देगा? क्या तब सिगरेट और सिगार के धुन का भी असर खत्म हो उठेगा?
सवाल ये है कि क्या सिर्फ होली के एक दिन पानी बचाने से हमारे देश मे शुद्ध पानी की नदियाँ बहने लगेगी? क्या तब सरकारी जल संस्थानों से बहने वाले पानी का कोई असर नहीं होगा? अगर ऐसा नही है तो फिर सिर्फ़ दीवाली के दिन पटाखों पर बैन क्यों? नए साल और क्रिसमस पर क्यों नहीं?
और अगर वाक़ई में इन्हें पर्यावरण की इतनी चिंता तो फिर..एक वीआईपी की सुरक्षा के लिए गाड़ी की कतार क्यों? वो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लेकर भी तो पर्यायवरण बचाओ अभियान का हिस्सा बन सकते हैं? और घरों में सैकड़ो एयर कंडीशन लगाने की परमिशन क्यों? क्या ये वीआईपी खुली प्राकृतिक हवा के बीच बैठकर पर्यावरण को बचाते हुए दीवाली पर पटाखे ना फोड़ने की नसीहत नहीं दे सकते?



