अर्थव्यवस्था में जान फूंकने वाले प्रवासियों के लिए आरक्षण कैसे बन रहा मुसीबत

विभिन्न राज्यों ने अपने स्थानीय निवासियों को सरकारी तथा प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान लाने का प्रारंभ कर दिया है। लेकिन इससे सबसे ज्यादा मुसीबत उन लोगों को उठानी पड़ेगी जो अपने प्रदेश को छोड़कर दूसरे प्रदेश में नौकरी करने जाते हैं।

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कोरोना संक्रमण के प्रकोप के बाद बहुत सारे प्रवासी मजदूर अपने घर लौटे थे। लेकिन अब इसी बीच खबर आ रही है कि अलग-अलग प्रदेश अपने स्थानीय निवासियों को सरकारी तथा प्राइवेट क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण देने का प्रावधान कर रहे हैं। हालांकि कुछ प्रदेशों ने ऐसा कर दिया है, और कुछ प्रदेश इस पर विचार भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रदेश में नौकरियों पर सबसे पहला हक प्रदेशवासियों का होना चाहिए। लेकिन साथ ही साथ राज्य सरकारों को और केंद्र सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि उनका यह कदम न जाने कितने लोगों को सड़क पर ला सकता है।

अगर हम 2019 के आंकड़ों पर गौर करें तो कम से कम 5 राज्य ऐसे हैं जिन्होंने सरकारी नौकरियों के साथ-साथ निजी औद्योगिक संस्थानों में भी स्थानीय लोगों के आरक्षण का प्रावधान लागू कर दिया है। जिनमें महाराष्ट्र आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और मध्य प्रदेश शामिल हैं। प्रवासियों को रोकने तथा स्थानीय लोगों को अपने यहां स्थान देने में एक सुरक्षित कदम बढ़ाने वाला राज्य अब हरियाणा भी बनने जा रहा है। मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने शुक्रवार को सरकारी तथा प्राइवेट संस्थानों में 75% नौकरियां राज्य के युवाओं के लिए आरक्षित कर देनी चाहिए ऐसा प्रावधान जल्द ही होने वाला है।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 2 दिन पहले ही ऐलान किया था कि मध्यप्रदेश में अब किसी भी सरकारी नौकरी में केवल मध्यप्रदेश में रहने वाले लोग ही अप्लाई कर सकेंगे। पहले यह योजना पूरे देश के लिए लागू की जाती थी। महाराष्ट्र एक ऐसा प्रदेश है जिससे संक्रमण के दौरान सबसे ज्यादा लोग अपने क्षेत्रों में लौटे थे। वर्तमान में महाराष्ट्र सरकार निजी क्षेत्र की 80% नौकरियां राज्य वासियों के लिए आरक्षित करने का कानून लाने की तैयारी कर रही है। अपने राज्य के लोगों को आरक्षण देना सही बात है। लेकिन अपने राज्य के लोगों को आरक्षण देने का अर्थ यह नहीं है कि आप देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले लोगों को मुख्यधारा से बाहर कर दें।

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